As a deity name
Name 791 of the Ganesha Sahasranāma — Ganesha Purana (Upasana Khanda), as taught by Sage Vyasa / Lord Ganesha
As a Hindi name
जैन · noun · masculine
जिन का प्रवर्तित धर्म । भारत का एक धर्म संप्रदाय जिसमें अहिंसा का परम धर्म माना जाता है और कोई ईश्वर या सृष्टिकर्ता नहीं माना जाता । विशष—जैन धर्म कितना प्राचीन है ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । जैन ग्रंथो के अनुसार महावीर या वर्धमान ने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था । इसी समय से पीछे कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं । उनके अनुसार यह धर्म बौद्ध धर्म के पीछे उसी के कुछ तत्वों को लेकर औऱ उनमें कुछ ब्राह्मण धर्म की शैली मिलाकर खडा़ किया गया । जिस प्रकार बौद्धों में २४ बुद्ध है उसी प्रकार जैनों में भी २४ तीर्थकार है । हिंदू धर्म के अनुसार जैनों ने भी अपने ग्रंथों को आगम, पुराण आदि में विभक्त किया है पर प्रो॰ जेकोबी आदि के आधुनिक अन्वेषणों के अनुसार यह सिद्ध किया गया है की जैन धर्म बौद्ध धर्म से पहले का है । उदयगिरि, जूनागढ आदि के शिलालेखों से भी जैनमत की प्राचीनता पाई जाती है । ऐसा जान पडता है कि यज्ञों के हिंसा आदि देख जो विरोध का सूत्रपात बहुत पहले से होता आ रहा था उसी ने आगे चलकर जैन धर्म का रूप प्राप्त किया । भारतीयों ज्योतिष में यूनानियों की शैली का प्रचार विक्रमीय संवत् से तीन सौ वर्ष पीछे हुआ । पर जैनों के मूल ग्रंथ अंगों में यवन ज्योतिष का कुछ भी आभास नहीं है । जिस प्रकार ब्रह्मणों की वेद संहिता में पंचवर्षात्मक युग है और कृत्तिका से नक्षत्रों की गणना है उसी प्रकार जैनों के अंग ग्रंथों में भी है । इससे उनकी प्राचीनता सिद्ध होती है । जैन लोग सृष्टिकर्ता ईश्वर को नहीं मानते, जिन या अर्हत् को ही ईश्वर मानते हैं । उन्हीं की प्रार्थना करते हैं और उन्हीं के निमित्त मंदिर आदि बनवाते हैं । जिन २४ हुए हैं, जिनकी नाम ये हैं—ऋषभदेव, अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनंदन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयांस- नाथ, वासुपूज्य स्वामी, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत स्वामी, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर स्वामी । इनमें से केवल महावीर स्वामी ऐतिहासिक पुरुष है जिनका ईसा से ५२७ वर्ष पहले होना ग्रंथों से पाया जाया है । शेष के विषय में अनेक प्रकार की अलौकीक और प्रकृतिविरुद्ध कथाएँ हैं । ऋषभदेव की कथा भागवत आदि कई पुराणों में आई है और उनकी गणना हिंदुओं के २४ अवतारों में है । जिस प्रकार काल हिंदुओं में मन्वंतर कल्प आदि में विभक्त है उसी प्रकार जैन में काल दो प्रकार का है— उत्सिर्पिणी और अवसर्पिणी । प्रत्येक उत्सिर्पिणी और अवसर्पिणी में चौबीस चौबीस जिन तीर्थंकर होते हैं । ऊपर जो २४ तीर्थंकर गिनाए गए हैं वे वर्तमान अवसर्पिणी के हैं । जो एक बार तीर्थ कर हो जाते हैं वे फिर दूसरी उत्सिर्पिणी या अवसर्पिणी में जन्म नहीं लेते । प्रत्येक उत्सिर्पिणी या अवसर्पिणी में नए नए जीव तीर्थंकर हुआ करते हैं । इन्हीं तीर्थंकरों के उपदेशों को लेकर गणधर लोग द्वादश अंगो की रचना करते हैं । ये ही द्वादशांग जैन धर्म के मूल ग्रंथ माने जाते है । इनके नाम ये हैं—आचारांग, सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग, भगवती सूत्र, ज्ञाताधर्मकथा, उपासक दशांग, अंतकृत् दशांग, अनुत्तोरोपपातिक दशांग, प्रश्न व्याकरण, विपाकश्रुत, हृष्टिवाद । इनमें से ग्यारह अंश तो मिलते हैं पर बारहवाँ हृष्टिवाद नहीं मिलता । ये सब अंग अर्धमागधी प्राकृत में है और अधिक से अधिक बीस बाईस सौ वर्ष पुराने हैं । इन आगमों या अंगों को श्वेताबंर जैन मानते हैं । पर दिगंबर पूरा पूरा नहीं मानते । उनके ग्रंथ संस्कृत में अलग है जिनमें इन तीर्थ करों की कथाएँ है और २४ पुराण के नाम से प्रसिद्ध हैं । यथार्थ में जैन धर्म के तत्वों को संग्रह करके प्रकट करनेवाले महावीर स्वामी ही हुए है । उनके प्रधान शिष्य इंद्रभूति या गौतम थे जिन्हें कुछ युरोपियन विद्वानों ने भ्रमवश शाक्य मुनी गोतम समझा था । जैन धर्म में दो संप्रदाय है — श्वेतांबर और दिगंबर । श्वेतांबर ग्यारह अंगों को मुख्य धर्म मानते हैं और दिगंबर अपने २४ पुराणों को । इसके अतिरिक्त श्वेतांबर लोग तीर्थ करों की मूर्तियों को कच्छु या लंगोट पहनाते हैं और दिगंबर लोग नंगी रखते हैं । इन बातों के अतिरिक्त तत्व या सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है । अर्हत् देव ने संसार को द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि बताया है । जगत् का न तो कोई हर्ता है और न जीवों को कोई सुख दु:ख देनेवाला है । अपने अपने कर्मों के अनुसार जीव सुख दु:ख पाते हैं । जीव या आत्मा का मूल स्वभान शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानंदमय है, केवल पुदगल या कर्म के आवरण से उसका मूल स्वरुप आच्छादित हो जाता है । जिस समय यह पौद्गलिक भार हट जाता है उस समय आत्मा परमात्मा की उच्च दशा को प्राप्त होता है । जैन मत स्याद्वा द के नाम से भी प्रसिद्ध है । स्याद्वाद का अर्थ है अनेकांतवाद अर्थात् एक ही पदार्थ में नित्यत्व और अनित्यत्व, साद्य्श्य और विरुपत्व, सत्व और असत्व, अभिलाष्यत्व और अनभिलाष्यत्व आदि परस्पर भिन्न धर्मों का सापेक्ष स्वीकार । इस मत के अनुसार आकाश से लेकर दीपक पर्यंत समस्त पदार्थ नित्यत्व और अनित्यत्व आदि उभय धर्म युक्त है · जैन धर्म के अनुयायी । जैनी — Śabdasāgara
जैन · noun · masculine
भोजन । आहार — Śabdasāgara
जैन · jain · s.m.
A Jain; a teacher of heterodox notions; a sect of Hindus who are worshippers of a number of Jins or great saints whom they regard as superior to the Hindu gods (they also deny the divine authority of the Vedas, and disregard the distinctions of caste) — Platts (1884), digital edition courtesy DSAL, University of Chicago, p. 414
जैन · feminine,masculine
a surname, Jain, from Sanskrit
जैन · masculine
a Jain
Cited formation "जैन" is जै + -न: जै means "As many as ( = jitnā)", and the suffix -न forms abstract nouns (masc. or fem.). CHD Basic Grammar App. I §8(18) — cited from the extracted rule table — base gloss: Platts (1884), digital edition courtesy DSAL, University of Chicago
a Hindi word; it is not Sanskrit
“Borrowed from Sanskrit जैन (jaina).” — per Wiktionary’s etymology record
As a Sanskrit word
Meaning
a worshipper of the Jinas, Jaina
Scripturally attested Verified derivationMultiple readings (6)Why this matches what you typed
The spelling you confirmed, जैन, is itself a dictionary headword — no grammatical transformation stands between what you typed and the meaning above.
Gender counterpart
The kosha attests this stem in the feminine, the masculine, and the neuter — the same name serves without alteration.
Dictionary citations
jaina mf(ī)n. relating to the Jinas, Sarvad. iii f.; Pārśvan. ii, 36
jaina m. a worshipper of the Jinas, Jaina, Sarvad. iii, vii, xi
(= زين) N. of a prince of Kaśmir
jaina m. (-naḥ) A Jaina, a follower of the principles of a Jina or teacher of heterodox notions, the chief of which are, the supremacy of certain religious pontiffs over the gods of the Hindus, a denial of the divine authority of the Vedas, and a disregard of the distinction of castes. E. jina a Jina, and aṇ aff.
Alternative readings
More than one analysis survives full verification. That ambiguity is real, so we show every reading rather than pick one silently.
Caveats
Sources contain errors and engines have limits; every claim above carries its citation so you can verify it. This is guidance about names and their sources — not religious or astrological consultation. How we work · Our sources